शरीर की परिभाषा
Definition of Sharir
According to Sushrut : -
Shlok :-
शुक्र शोणितं गर्भाशयस्थम् आत्मप्रकृतिविकार सम्मूर्च्छितम् ' गर्भ ' इत्युच्यते ।
तं चेतनावस्थितम् वायु: विभजति , तेज एनं पचति, आपः क्लेदयन्ति, पृथ्वी संहन्ति, आकाशं विवर्धयति, एवं विवर्धित: ,
स यदा हस्त-पाद-जिव्हा-घ्राण-कर्ण-नितम्बादिभि: अंगे रुपेतस्तदा 'शरीर' इति संज्ञा लभते।।
Hindi :-
गर्भाशय में स्थित आत्मा , प्रकृति और विकारों से युक्त शुक्र और शोणित गर्भ कहलाता है |
प्रकृति - अष्ट प्रकृति
१. प्रकृति
२.महत्
३. अहंकार
४. पञ्चतन्मात्रा
इस चेतना युक्त गर्भ में वायु द्वारा विभाजन ,
तेज़ द्वारा पाचन ,
अप या जल के द्वारा क्लेदन या आद्रता ,
पृथ्वी के द्वारा सहनन या कठिनता ,
आकाश महाभूत के द्वारा विवर्धन या आकार में बड़ा होना,
होता है।
इस प्रकार परिवर्धित या वृद्धि को प्राप्त हो गर्भ
जब हस्त, पाद, जिह्वा , कर्ण, नितम्ब, आदि अंगों से युक्त होता है ,
तब शरीर संज्ञा को प्राप्त होता है।
According to चरक : -
तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पंचमहाभूतविकारसमुदायात्मकम् समयोगवाहि ।।
Hindi :-
जो चेतना का अधिष्ठान हो,
जिसके घटक पञ्चमहाभूतों के विकार से निर्मित हो ,
और ये घटक समत्व की अवस्था में रहकर सहयोग से कार्य करते हो ,
उसे शरीर कहते हैं।
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